राहुल गाँधी जी ओरिसा जाने से पहले जगदलपुर बस्तर में

राहुल गाँधी जी ओरिसा जाने से पहले जगदलपुर बस्तर में

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

कोई कैसे औरो की तकदीर लिख सकता है

एहसास को शब्दों में पिरोकर लिखता हूँ
में ज़िन्दगी जी कर वक़्त की दास्ताँ लिखता हूँ

दीखता है जो वो हमेशा सच नहीं होता
में दिल से सच की सच्चाई देखता हूँ

कोई कैसे औरो की तकदीर लिख सकता है
में इंसान की इसे बड़ी नादानी सोचता हूँ

जज्बा मोहाबत का बस एक पल है दिलो में
निभाते है जो वफ़ा की रस्मे दीवानगी समझता हूँ

कभी ज़ख्म मिले तो तुम मायूस मत होना
गिरकर जो संभलते है लोग जीतेंगे जानता हूँ

10 टिप्‍पणियां:

  1. हौसले बढ़े है हमारे कभी कभी
    जीते हजार बार तो हारे कभी कभी..
    चलो एक बार फिर अपनी ख्वाहिशे दोहराएं
    होते है मेहरबान ये सितारे कभी कभी..
    ख्यालों का भी अपना एक अलग मज़ा है
    लगते है खूबसूरत ये नज़ारे कभी कभी..
    लहरों से उलझ के भी खुद पे रखना यकीन
    पास आते है खुद चल के ये किनारे कभी कभी!!!!

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  2. ख़ूबसूरत हैं वो लब
    जो प्यारी बातें करते हैं

    ख़ूबसूरत है वो मुस्कराहट
    जो दूसरों के चेहरों पर भी मुस्कान सजा दे

    ख़ूबसूरत है वो दील
    जो कीसी के दर्द को समझे
    जो कीसी के दर्द में तडपे


    ख़ूबसूरत हैं वो जज्बात
    जो कीसी का एहसास करें

    ख़ूबसूरत है वो एहसास
    जो कीसी के दर्द मे दवा बने


    ख़ूबसूरत हैं वह बातें
    जो कीसी का दील न दुखाएं

    ख़ूबसूरत हैं वो आंखें
    जीन में पाकेजगी हो

    शर्म-ओ-हया हो
    ख़ूबसूरत हैं वो आंसू
    जो कीसी के दर्द को महसूस करके बह जाए

    ख़ूबसूरत हैं वो हाथ
    जो कीसी को मुश्कील वक्त में थाम लें

    ख़ूबसूरत हैं वो कदम
    जो कीसी की मदद के लिए आगे बढें!!!!!

    ख़ूबसूरत है वो सोच
    जो कीसी के लिए अचछा सोचे

    ख़ूबसूरत है वो इन्सान
    जीस को खुदा ने ये
    खूबसूरती अदा की

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  3. मुझे आज अपनी बेबसी पर रोना आया
    मैंने खुद को क्या सारे दोस्तों को आजमाया
    हर एक दोस्त की हर तकलीफ को दूर किया
    पर खुद को हर मोड़ पर अकेला पाया

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  4. वो मेरे हर झूठ से खुश होता,
    जिसे हमेशा सच बोलने की आदत थी,
    वो एक आंसू भी गिरने पर खफा होता था,
    जिसे तन्हाई में रोने की आदत थी,
    वो कहता था के मुझे भूल जायेगा,
    जिसे मेरी हर बात याद रखने की आदत थी,
    हमेशा माफ़ी मांगने के गर से
    रोज़ गलतियाँ करना उस की आदत थी,
    वो जो दिलो-ओ-जान निछावर करता था मुझ पर,
    मगर छोटी सी बात पर रूठना उस की आदत थी,
    हम उस के साथ चल दिए यह जानते हुए भी,
    राह में हर एक को छोड़ देना उस की आदत थी

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  5. कुछ दूर हमारे साथ चलो..
    हम अपनी कहानी कह देंगे..
    समझे न जिसे तुम आँखों से..
    वो बात ज़ुबानी कह देंगे..
    फूलों की तरह जब होठो पे..
    एक शोख तबस्सुम बिखरेगा..
    धीरे से तुम्हारे कानों में..
    एक बात पुरानी कह देंगे..
    इकरार-ए-वफ़ा तुम क्या समझो..
    इज़हार-ए-वफ़ा तुम क्या जानो..
    हम ज़िक्र करेंगे गैरों का..
    और अपनी कहानी कह देंगे

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  6. मत पूछिए कि कैसे सफ़र काट रहे हैं
    हर साँस एक सज़ा है मगर काट रहे हैं

    ख़ामोश आसमान के साये में बार-बार
    हम अपनी तमन्नाओं का सर काट रहे हैं

    कमज़ोर छत से आज भी एक ईंट गिरी है
    कुछ लोग हैं कि फिर भी गदर काट रहे हैं

    आधी हमारी जीभ तो दाँतों ने काट ली
    बाकी बची को मौन अधर काट रहे हैं

    दो चार हादसों से ही अख़बार भर गए
    हम अपनी उदासी की ख़बर काट रहे हैं

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  7. होता कैसे उन्हें गम हमारी रुसवाई का ,
    जब फर्क पड़ा ही नहीं उन्हें हमारी जुदाई का ,
    खामोशी से सहा हमने जब हर गम ,
    तो इल्जाम लगा दिया बेवफाई का

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  8. अपने दिल को दिल का बना कर रखना ,
    हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

    उड़ना हवा में खुल कर लेकिन तुम,
    अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

    छाव में माना मिलता है सुकून बहुत ,
    फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

    उम्रभर तो साथ रिश्ते भी नहीं रहते,
    यादों में किसी को सजा कर रखना ।

    वक्त के साथ चलते-चलते, खो ना जाना ,
    खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

    रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
    अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

    तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
    कश्ती और मांझी का पता कर रखना ।

    हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
    ज़ख्मों को अपनो से बता कर रखना ।

    दर्द कभी भी आखरी नहीं होता ,
    अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

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  9. मैं क्या बतलाऊँ कौन हूँ मैं

    मैं अच्छा हूँ बदनाम भी हूँ
    आगाज़ भी हूँ अंजाम भी हूँ
    मैं बहती मंद बयार भी हूँ
    कभी जीत हूँ तो कभी हार भी हूँ
    कभी भेद खोलता सत्य हूँ तो कभी राज छुपाता मौन हूँ मैं
    मैं क्या बतलाऊ कौन हूँ मैं?

    मैं पर्वत भी मैं खाई भी
    मैं ही खुद की परछाई भी
    मैं पापी कामी आत्मा भी
    मैं परम सत्य परमात्मा भी
    मैं क्या अब अपना परिचय दूं, मैं खुद न जानू कौन हूँ मैं
    मैं क्या बतलाऊँ कौन हूँ मैं?

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  10. मैं क्या बतलाऊँ कौन हूँ मैं

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