राहुल गाँधी जी ओरिसा जाने से पहले जगदलपुर बस्तर में

राहुल गाँधी जी ओरिसा जाने से पहले जगदलपुर बस्तर में

रविवार, 1 जुलाई 2012

मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को मगर हर आंख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है
बिकता अगर प्यांर जो कौन नहीं खरीदता बिकती अगर खुशियां तो कौन उसे बेचता दर्द अगर बिकता तो हम आपसे खरीद लेते और आपकी खुशियों के लिए हम खुद को बेच देते”
“कोई ऐसा दोस्त बनाया जावे जिसके आंसू को पलकों में छुपाया जाये रहे उसका मेरा रिश्ताम कुछ ऐसा कि अगर वो उदास हो तो हमसे भी ना मुस्कुजराया जावें ”
फूल हर किसी की चाहत का, मुंतजिर सिर्फ इसलिए रहा है। क्योंकि उसने काटों के बीच, जीने का दर्द सहा है।।
सागर की लहरों को देखकर सोचता हूँ ये साहिल से टकरा कर वापस लौट जाती हैं करती हे वो साहिल से बेवफाई या सागर से वफ़ा निभाती है.
आज हम हैं कल हमारी यादें होंगी जब हम ना होंगे तब हमारी बातें होंगी कभी पलटोगे जिंदगी के ये पन्ने तब शायद आपकी आंखों से भी बरसातें होंगी
मैं बोलता गया हूँ वो सुनता रहा खामोश ऐसे भी मेरी हार हुए है कभी कभी
निगाहों में कोई भी दुशरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ऐ मैं ही था बचा के खुद को ले आया किनारे तक समुन्द्र ने बहोत मौका दिया था डूब जाने का
शहीदों के वतन कि कब्र से ऐ आवाज़ आई वही मिले हम से आकार जो अपनी जान पर खेले है उधर दुनिया कि राहत है इधर लुत्फे शाहदत है ऐ सौदा है तेरे आगे तू जो जाहे वही लेले
सराफत से यहाँ कौन डरता है किसी का कुछ ना बिगाडो तो कौन डरता है
है दुवा माँ कि साथ जिसके वो कभी दर बदर नही होगा



मजा चख लेने दो उसको भी गैरो की महफिल का इतनी चाहत के बाद जो मेरा ना हुआ वो किसी और का क्या होगा

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